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झाबुआ

जो व्यक्ति ,समाज, संगठन ,राष्ट्र मर्यादा और अनुशासन में रहेगा ,वही विकास की ऊंचाइयों को छू लेगा :- साध्वी श्री उर्मिला कुमारी जी

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झाबुआ – तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशधिशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की सुशिष्या साध्वी श्री उर्मिला कुमारी जी ठाणा-4 के पावन सानिध्य में गुरुवार को 160 वा मर्यादा महोत्सव , शहर के 52 जिनालय मंदिर में मनाया गया । तेरापंथ धर्मसंघ की एकता, संगठन ,अनुशासन और मर्यादा का प्रतीक है मर्यादा महोत्सव ।

सुबह करीब 9:00 बजे कार्यक्रम साध्वी श्री उर्मिला कुमारी जी, साध्वी श्री मृदुलयशा जी, साध्वी श्री त्रतु यशा जी, साध्वी श्री ज्ञानयशा जी द्वारा नमस्कार महामंत्र के उच्चारण के साथ प्रारंभ हुआ । साध्वीवृंद द्वारा मंगलाचरण गीत का संगान किया गया । पश्चात महिला मंडल झाबुआ द्वारा मर्यादा पर सुंदर गीत की प्रस्तुति दी । महिला मंडल अध्यक्ष पुखराज चौधरी ने सभी आगंतुकों को शब्दों के माध्यम से अभिवंदन किया । तेरापंथ युवक परिषद अध्यक्ष प्रमोद कोठारी द्वारा मुक्तक के माध्यम से अपनी भावना व्यक्त की। ज्ञानशाला के बच्चों ने अपने ड्रेस कोड में मनमोहक प्रस्तुति देकर जैन धर्म का प्रचार किया । महिला मंडल द्वारा गीत व नॉटय प्रस्तुति का सुंदर समन्वय देखने को मिला । साध्वी श्री मृदुलयशा जी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा मर्यादा महोत्सव मनाने की परंपरा तेरापंथ की अपनी मौलिकता है विशेषता है संघ की वैधानिक, संगठनात्मक और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों का केंद्र है मर्यादा महोत्सव साधु साध्वियों, समण समणियो की सारणा वारणा, सार – संभाल का समय है मर्यादा महोत्सव । साध्वी श्री ने यह भी बताया कि भगवान महावीर की ज्ञान और चेतना विकसित हुई थी तो वह केवली बन गए । उन्होंने चार तीर्थ की स्थापना भी की । जब धर्म संघ बना तो विधि विधान बनाए गए । बिना विधि विधान के कोई भी संघ संगठन समाज या राष्ट्र – विधि विज्ञान के बगैर चल नहीं सकता । 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और उसके बाद देश को चलाने के लिए विधि विधान की आवश्यकता हुई । तब 3 वर्ष बाद 1950 में संविधान का निर्माण हुआ , जो गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है । बिना मर्यादा के जीवन नहीं चल सकता । आपने आचार्य श्री महाश्रमण के तीन सिद्धांत सद्भावना, नैतिकता व नशा मुक्ति के बारे में समझाया । आपने यह भी बताया कि जैन धर्म के तीन सिद्धांत अहिंसा ,अनेकांत और अपरिग्रह हैं । इन तीन सिद्धांतों को अपनाकर सिद्धत्व को प्राप्त कर सकते हैं । हम हमारी संस्कृति में आने का प्रयास करें , जीने का प्रयास करें ,याने मर्यादाओं में रहे ।

साध्वी श्री उर्मिला कुमारी जी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा की तेरापंथ धर्म संघ की स्थापना आचार्य श्री भिक्षु ने विक्रम संवत 1817 में की थी । स्थापना के 15 वर्ष बाद विक्रम संवत 1832 में संघ के लिए एक मर्यादा पत्र तेरापंथ धर्म संघ के लिए नीव का काम कर रहा है । विक्रम संवत 1859 माघ शुक्ल सप्तमी को अंतिम मर्यादा पत्र लिखा गया । विक्रम संवत 1921 में चतुर्थ आचार्य जयाचार्य द्वारा प्रथम मर्यादा महोत्सव मनाया गया । साध्वी श्री ने तेरापंथ धर्मसंघ की मूलभूत मर्यादा बताई -1. प्रथम सभी साधु-साध्वी एक ही आचार्य की आज्ञा में रहे । 2. विहार चातुर्मास आचार्य की आज्ञा से करें ।3. अपने-अपने शिष्य शिष्य ना बनाएं ।4.आचार्य योग्य व्यक्ति को दीक्षित करें , दीक्षित करने के बाद आयोग्य निकले , तो गण से बाहर कर दें ।.5.वर्तमान आचार्य जिसको भी अपना उत्तराधिकारी के रूप में चुने , उसे संपूर्ण संघ स्वीकार करें । आपने यह भी बताया कि जीवन में चार कषाय हैं क्रोध ,मान , माया , लोभ.। जब तक इन कषायो को नाश नहीं होता , तब तक आध्यात्मिक विकास नहीं होगा । साध्वी श्री ने यह भी बताया कि जैसे हाथी के लिए अंकुश, घोड़े के लिए लगाम, नदियों के लिए पुल , खेतों के लिए प्राकार , भीड़ के लिए कंट्रोलिंग पावर की आवश्यकता होती है । वैसे ही एक व्यक्ति के लिए अनुशासन और मर्यादा अपेक्षित है । बिना मर्यादा के कोई भी अपने अस्तित्व को सुरक्षित नहीं रख पाएगा । अनुशासन और आज्ञा के बिना , कोई भी संस्था या संगठन, विनाश की कगार पर पहुंच सकता है बिना मर्यादा के कोई भी अपने अस्तित्व को सुरक्षित नहीं रख पाएगा । वही व्यक्ति मर्यादाओं का निर्माण कर सकता है जिनमें पांच बलों का समावेश होता है । मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम , लंका विजय करने के लिए , पुल का निर्माण किया जा रहा था उसे समय वानरो के द्वारा जो पत्थर फेक जा रहे थे वह सारे पानी में तैर रहे थे । उन पत्थरों पर राम नाम अंकित था । भगवान राम ने सोचा वानर सेना द्वारा जो पत्थर फेंक रहे हैं तैर रहे हैं । मेरे द्वारा फेंका हुआ पत्थर क्यों नहीं तैर रहा है । भगवान राम ने पत्थर फेके तो वे डूब गए । जिस पत्थर पर राम नाम अंकित है उसे पत्थर को कोई डुबो नहीं सकता। जिस पत्थर पर राम नाम का सहारा नहीं लिया गया , वह डूब गए । कहने का तात्पर्य कि यदि धर्म में आस्था है तो जीवन रूपी नाव तर जाएगी , अन्यथा डूब जाएगी । जो मर्यादा में रहेगा वह विकास की ऊंचाइयों को छू लेगा और जो मर्यादा से मुक्त रहना चाहता है उसने अपने लिए विनाश के द्वार खोल लिए हैं । मर्यादा और अनुशासन हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है । आज्ञा, अनुशासन मर्यादा के बिना मनुष्य केवल हड्डियों का ढांचा है । साध्वी श्री ज्ञानयशा जी ने कविता के माध्यम से अपनी बात कही ।

कार्यक्रम में राजगढ़ महिला मंडल , बोरी महिला मंडल द्वारा मर्यादा और अनुशासन पर सुंदर गीतिकाओं की प्रस्तुति दी । मूर्ति पूजक संघ अध्यक्ष मनोहर भंडारी ने भी धर्म सभा को संबोधित करते हुए जैन एकता पर बल दिया व संजय मेहता ने भी संबोधित किया । समाजसेवी यशवंत भंडारी ने भी धर्म और जैन एकता पर अपने वक्तव्य दिए । पेटलावद से फूलचंद कांसवा, बोरी से लालचंद गांधी ने भी कार्यक्रम में धर्म सभा को संबोधित किया। वर्धमान स्थानकवासी समाज से प्रदीप रूनवाल ने अपनी बात कही । कार्यक्रम के अंत में साध्वीवृंद द्वारा उनकी मर्यादाओं का उच्चारण किया गया । पश्चात उपस्थित समाजजन द्वारा श्रावक निष्ठा पत्र का वाचन किया गया । अंत में उपस्थित जनसभा ने तेरापथ समाज का संघ गीत का संगान किया । कार्यक्रम का सफल संचालन महासभा सदस्य पंकज कोठारी ने किया व आभार तेरापंथ सभा के सचिव दीपक चौधरी ने माना ।

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