भरत भूमि के गुजरात के थराद नगर के समीप पेपराल नामक गांव में एक पूनमचंदजी नाम की एक महान विभूति का जन्म माता पार्वती के गर्भ से वि. स.1993 मगसल कृष्ण तेरस और 11दिसंबर 1936 को हुआ था पिता का नाम स्वरूपचंदजी धरू था एक बहन और पांच भाइयों से भरा पूरा परिवार जैन धर्म, व धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत था..! पूनमचंदकी का शांत,धार्मिक,एवं गंभीर स्वभाव था इन्हीं संस्कारों के चलते वि.स.2004 मे प.पूज्य आचार्य श्री मद विजय यतींद्र सुरीश्वरजी मा.सा.का चातुर्मास थराद नगर में हुआ इस समय पूनमचंदजी की आयु मात्र 11 वर्ष थी,गुरुदेव श्री के वैराग्यपूर्ण प्रवचन सुन पूनमचंदजी में सुप्तावस्था में रहा वैराग्य का बीज अंकुरित हो उठा..!!! इस प्रकार माघ शुक्ल 4 रविवार वि.स.2010 दिनांक 7/2/1954 के पावन दिन दीक्षा का मुहूर्त प्रदान किया गया एवं नव दीक्षित का नाम जयंतविजयजी घोषित किया गया..!!!! फिर मुनि जीवन के 30 वर्ष पश्चात 15 फरवरी 1984 को भांडवपुर में मुनिराज श्री जयंत विजय जी को सूरी पद से विभूषित किया गया इस प्रकार मुनिराज को श्री मद विजय जयंतसेन सुरीश्वरजी मा.साहेब.के नाम से अलकृत किया गया.!!!!! ऐसे नीर जैसे निर्मल,चंद्रमा जैसे शीतल,सागर जैसे गंभीर,पर्वत जैसे अटल,अमृत पुरुष दीक्षा दानेश्वरी,लोकसंत,राष्ट्रसंत,नवकार आराधक,वचन सिद्धि ऐसे गुरुदेव श्री मद विजय जयंतसेन शुरूश्वरजी महाराज साहेब को सूरी पदवी आज से 42 वर्ष पूर्व दी गई थी इसी पाट परम्परा को पाटोत्सव के रूप में आज 10 फरवरी 2025 को बड़े हर्षौल्लास पूरे परिषद परिवार द्वारा इस प्रकार मनाया गया सुबह श्री भक्तांमर पाठ,गुरु गुण इक्कीसा पाठ,सामुहिक सामयिक,उसके पश्चात बहु परिषद के द्वारा पुण्य सम्राट के जीवन पर एकांगी प्रस्तुति ,प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता, गुरुदेव पर निबंध प्रतियोगिता, तरुण परिषद द्वारा रात्रि में 42 दीप प्रज्वलन एवं संगीतमय गुरुभक्ति,जाप,आरती,की गई एवं पूरे परिषद परिवार द्वारा उपध्यान तप के तपस्वियों का बहुमान किया गया पाटोत्सव पर *अखिल भारतीय श्री राजेंद्र जयंत बहु परिषद शाखा झाबुआ* की महिलाएं