तपस्वी श्रीमती पिंकी कटकानी ने 9 उपवास का पारणा किया ।
झाबुआ – पुरुषार्थ के चार प्रकार जिनशाशन गौरव आचार्य भगवंत पूज्य उमेश मुनि जी महाराज साहब ने” मोक्ष पुरुषार्थ “पुस्तक में बताएं है धर्म, अर्थ ,काम और मोक्ष। लोकमंगल के कार्य करना, दान देना, शिक्षण में सहयोग देना ,स्वास्थ्य उपचार में सहयोग देना, पुण्य कार्य करना धर्म पुरुषार्थ है । अर्थ पुरुषार्थ का मतलब धन पेसो से हे । इसमें व्यक्ति ज्यादा समय देता है।अर्थ अनर्थ की जड़ है ।अर्थ के लिए पुत्र अपने पिता की हत्या तक कर देता हैं । जीवन यापन के लिए व्यक्ति अर्थ का उपार्जन करता है । काम पुरुषार्थ इंद्रियों के द्वारा होता हे । यह शब्द, रूप, गंध, स्पर्श ,रस से संबंधित है । मोक्ष पुरुषार्थ से रागद्वेष से छुटकारा प्राप्त होता है । सकल कर्मों का क्षय होता है ।विकारी भावो का पूर्ण क्षय हो जाता है। उक्त वचन संयम उपवन वर्षावास हेतु रुनवाल बाजार स्थित महावीर भवन पर वीरजीत पूज्या महासती प्रज्ञा जी म.सा ने धर्म सभा में कहे । साध्वी पूर्णता जी ने बताया कि प्रभु महावीर स्वामी जी ने अंतिम समय में उत्तराध्ययन सूत्र की 3 दिन तक देशना दी थी, इसमें संयमी आत्माओं का वर्णन बताया था। साध्वी जी ने बताया कि संयमी आत्माओं को 22 प्रकार के परिषह आते हैं।संयमी आत्मा उन परिषहो को समभाव पूर्वक सहन करते हैं।परिषह सहन करने से कर्मों की विशेष निर्जरा होती है। पूर्व भव के कर्मों के कारण कष्ट आते हैं, उन्हें सहन करना पड़ता है। समभाव से परिषह सहन करने से नए कर्मों का बंध नहीं होता है। साधक धैर्यपूर्वक परिषह सहन करता है । धैर्य का फल मीठा भी होता है। संयमी आत्मा धैर्यवान होते है। संयमी आत्मा इन्हें सहन कर प्रसन्न होते हैं। ज्ञानावरणीय कर्म , अन्तराय कर्म,वेदनीय कर्म ,मोहनीय कर्म के उदय से परिषह आते हैं। आत्मा की मुख्य जरूरत रोटी, कपड़ा और मकान है। संयमी आत्माओ को भी इन सभी की आवश्यकता होती है। तपस्या के क्रम मैं पूज्या महासती प्रज्ञा जी के मुखारविंद से अर्हम घोड़ावत और लव कटारिया ने 10 उपवास के प्रत्याख्यान लिए।