झाबुआ

भगवान प्रभु श्री महावीर के निर्वाण का समय गुजरता जा रहा है। वैसे– वैसे मनुष्य की बुद्धि क्षीण होती जा रही है।साध्वी अनुभवदृष्टा जी

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जैसे-जैसे भगवान प्रभु श्री महावीर के निर्वाण का समय गुजरता जा रहा है। वैसे– वैसे मनुष्य की बुद्धि क्षीण होती जा रही है। आश्रव निरंतर रुप से जारी है, आश्रव का अर्थ पापों का आना। सवंर यथार्थ हमारे सारे आते हुए पापों को रोकना है। यह वचन मंगलवार को बावन जिनालय स्थित पाैषध भवन में प्रवचन के दौरान साध्वी अनुभवदृष्टा जी ने कहे।
इस दौरान साध्वीश्री ने एक दृष्टांत के माध्यम से समझाया कि एक बार एक नाव में दस लोग बैठकर नदी पार कर रहे थे कि बीच भंवर में नाव के पेंदे में छेद हो गया। जिससे नाव में पानी भरने लगा, तो एक यात्री ने कहा कि छेद को किसी भी तरह बंद कर दो, दूसरे यात्री ने कहा कि एक दूसरा छेद कर दो ताकि आने वाला पानी इसी छेद से निकल जाएगा। कहने का तात्पर्य है कि हमसे यदि त्रुटि वश कोई भूल अथवा पाप हो जाए, तो उसे स्वयं के ध्यान में आने पर तत्काल प्रायश्चित लेना चाहिए एवं भविष्य में उस पाप की पुनरावती नहीं हो यह संकल्प लेना चाहिए। जिनेश्वर देव की आज्ञा का पालन ही सर्वोपरि धर्म है। मिथ्यात्व से दूर रहकर समकित में जाना है। मिथ्यात्व से बाहर आने का उदाहरण प्रस्तुत किया। कहा कि जब हम बाजार से मिट्टी का घड़ा लाते हैं तो पहली बार उसमें पानी भर कर रख देते हैं, ताकि पानी का झमण हो सके। इस पर से एक बार साधु भगवंत ने टिप्पणी करी कि मटके से पानी निकल गया है। यही साधु भगवंत दूसरे दिन उसी घर गाेचरी लेने के लिए पहुंच गए। श्राविका ने उनके पात्र में एक चावल का दाना डालकर एक बूंद गर्म पानी डाला और कहा कि मुनि भगवंत मैंने जो वोहराना था वह वोहरा दिया है। मुनि भगवंत को अपने द्वारा की गई टिप्पणी का एहसास हो गया। मुनि भगवंत ने शुक्ल ध्यान ध्याया एवं उन्हें कैवल्य ज्ञान हो गया। धर्म सभा में वरिष्ठ श्रावक हमीरमल कासवा, श्रीसंघ अध्यक्ष संजय मेहता, अशोक कटकानी, धर्मचंद मेहता, महेंद्र कोठारी, राजेंद्र रुनवाल, कमलेश भंडारी, रमेश छाजेड़, अनिल रुनवाल, सुनील संघवी, नरेंद्र पगारिया, सुनील राठौर, सुरेंद्र काठी, अशोक राठौड़, अर्पित कटारिया आदि उपस्थित रहे।

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