झाबुआ

16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध”  एक तर्कपूर्ण विचार

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हाल ही में माननीय मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर रोक संबंधी टिप्पणियाँ एक गंभीर सामाजिक बहस को जन्म देती हैं। वर्तमान डिजिटल युग में सोशल मीडिया मानव जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। परंतु यह जितना उपयोगी है, उतना ही संवेदनशील भी—विशेषकर नाबालिग बच्चों के लिए। इस विषय पर तर्कपूर्ण विचार निम्न हैं।
प्रतिबंध के पक्ष में तर्क
1. मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव
16 वर्ष से कम आयु के बच्चे भावनात्मक व मानसिक रूप से पूर्णतः परिपक्व नहीं होते। सोशल मीडिया पर तुलना, लाइक्स, ट्रोलिंग और साइबर बुलिंग से अवसाद, चिंता और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं।
2. पढ़ाई और सामाजिक विकास में बाधा
अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों का ध्यान पढ़ाई, खेलकूद और पारिवारिक संवाद से हटाता है, जिससे उनका सर्वांगीण विकास प्रभावित होता है।
3. ऑनलाइन अपराधों का खतरा
बच्चों के साथ ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, ब्लैकमेलिंग और फर्जी पहचान के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कम उम्र के बच्चे इन खतरों को पहचानने में असमर्थ रहते हैं।
4. अनुचित कंटेंट की पहुंच
उम्र की सीमा के बावजूद बच्चे हिंसा, अश्लीलता, नशा और आक्रामकता से जुड़े कंटेंट तक आसानी से पहुँच जाते हैं, जो उनके नैतिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

प्रतिबंध के विरोध में तर्क
1. शैक्षणिक और रचनात्मक उपयोग
कई प्लेटफॉर्म ज्ञान, कौशल विकास, रचनात्मकता और सामाजिक जागरूकता के लिए भी उपयोगी हैं। पूर्ण प्रतिबंध इन सकारात्मक अवसरों को सीमित कर सकता है।
2. डिजिटल साक्षरता की आवश्यकता
आज का युग डिजिटल है। यदि बच्चों को पूरी तरह सोशल मीडिया से दूर रखा गया, तो वे तकनीकी समझ और जिम्मेदार उपयोग सीखने से वंचित रह सकते हैं।
3. व्यावहारिक क्रियान्वयन की चुनौती
उम्र सत्यापन की व्यवस्था कमजोर है। केवल कानूनी प्रतिबंध से व्यवहारिक नियंत्रण कठिन होगा।

निष्कर्ष
16 वर्ष से कम आयु के बच्चों पर पूर्ण प्रतिबंध की बजाय नियंत्रित, निगरानीयुक्त और मार्गदर्शित उपयोग अधिक व्यावहारिक और प्रभावी समाधान हो सकता है। जिसमेंअभिभावकों की सक्रिय भूमिका के साथ-साथ स्कूलों में डिजिटल एथिक्स की शिक्षा,सख्त आयु सत्यापन व्यवस्था, बच्चों के लिए सुरक्षित (Child-friendly) सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, इंटरनेट सेवा प्रदाताओं द्वारा पैरेंटल विंडो सर्विस देना आदि उपायों के साथ न्यायालय की मंशा—बच्चों की सुरक्षा और भविष्य—को सार्थक रूप से पूरा किया जा सकता है।

      अंततः उद्देश्य सोशल मीडिया से बच्चों को काटना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित, जागरूक और जिम्मेदार डिजिटल नागरिक बनाना होना चाहिए।
लेखक अभिभाषक श्री चंचल भंडारी, सदस्य न्यायपीठ बाल कल्याण समिति झाबुआ मध्यप्रदेश।

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