झाबुआ

किशोर न्याय अधिनियम, बाल अधिकार संरक्षण कानून और शिक्षा से जुड़े दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हर बच्चे को सम्मान, गरिमा और सुरक्षित वातावरण में पढ़ने का अधिकार है।

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– श्री चंचल भंडारी एडवोकेट व सदस्य न्यायपीठ बाल कल्याण समिति झाबुआ म.प्र.
“बुलिंग”: बच्चों के मन पर पड़ता गहरा घाव — वर्तमान परिप्रेक्ष्य
आज का समय तकनीक, प्रतिस्पर्धा और तेज़ बदलाव का है, लेकिन इसी के साथ एक गंभीर समस्या भी तेजी से उभर रही है—”बुलिंग’। यह केवल बच्चों द्वारा बच्चों को चिढ़ाने या डराने तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई बार शिक्षक या स्टाफ द्वारा बच्चों को टोंट मारना, अपमानित करना या सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाना भी बुलिंग का रूप ले चुका है। यह प्रवृत्ति बच्चों के मन, आत्मसम्मान और भविष्य पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव डाल रही है।
बच्चों के बीच बुलिंग अक्सर नाम बिगाड़ने, शरीर, रंग, जाति, धर्म, भाषा, आर्थिक स्थिति या पढ़ाई के आधार पर की जाती है। कुछ बच्चे इसे “मज़ाक” समझते हैं, लेकिन जिस पर यह किया जाता है, उसके लिए यह मज़ाक नहीं बल्कि मानसिक हिंसा बन जाती है। लगातार अपमान, डर और तिरस्कार झेलने वाला बच्चा भीतर ही भीतर टूटने लगता है। वह चुप हो जाता है, अकेलापन महसूस करता है और कई बार पढ़ाई से भी दूर होने लगता है।
आज की बुलिंग केवल स्कूल के प्रांगण तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे और अधिक खतरनाक बना दिया है। व्हाट्सएप ग्रुप, इंस्टाग्राम, फेसबुक, ऑनलाइन क्लास के दौरान की गई टिप्पणियाँ और मीम्स बच्चों को 24 घंटे मानसिक दबाव में रखती हैं। इससे आत्मविश्वास की कमी, अवसाद, चिंता और आत्महत्या जैसे विचार तक जन्म ले सकते हैं। चिंता का विषय यह भी है कि कई बार शिक्षक या स्टाफ जो बच्चों के मार्गदर्शक और संरक्षक होने चाहिए, अनजाने या जानबूझकर बच्चों को ताने मार देते हैं—“तुमसे कुछ नहीं होगा”, “तुम बहुत कमजोर हो”, “तुम्हारे बस की बात नहीं है” या किसी अन्य की बातों में आकर बच्चों को टारगेट करना आदि जैसे बच्चों के मन में स्थायी चोट छोड़ देते हैं। स्कूल या कक्षा के सामने अपमानित किया गया बच्चा न केवल सीखने से डरने लगता है, बल्कि स्वयं को ही दोषी मानने लगता है। यह शिक्षक की शक्ति का अनुचित प्रयोग है, जो अनुशासन नहीं बल्कि डर पैदा करता है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि बुलिंग अनुशासन नहीं है और टोंट प्रेरणा नहीं है। अनुशासन संवाद से आता है, भय से नहीं। बच्चों को सुधारने के लिए सहानुभूति, मार्गदर्शन और सकारात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। बच्चों को स्कूल और कक्षा में घर जैसा और भय मुक्त वातावरण देना संस्था, स्कूल और शिक्षक की जिम्मेदारी है। विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संस्कार और मानवीय मूल्यों की प्रयोगशाला होते हैं।
इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब स्कूलों में एंटी-बुलिंग नीति को प्रभावी रूप से लागू किया जाए,
शिक्षकों को बाल मनोविज्ञान और संवेदनशील व्यवहार का प्रशिक्षण दिया जाए, बच्चों को अपनी बात कहने के लिए डर-मुक्त मंच मिले, और अभिभावक बच्चों की चुप्पी को समझने का प्रयास करें।
         अंततः हमें यह याद रखना होगा कि एक ताना बच्चे का आत्मविश्वास छीन सकता है और एक सहारा उसे जीवन दे सकता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे आत्मनिर्भर, सशक्त और संवेदनशील नागरिक बनें, तो आज ही बुलिंग के हर रूप के खिलाफ खड़ा होना होगा—चाहे वह बच्चे द्वारा हो या शिक्षक द्वारा।
क्योंकि मजबूत समाज की नींव बच्चों को डरा कर नहीं, बल्कि उनके विश्वास और सम्मान पर टिकी होती है।

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