“ (बच्चों में संस्कारों की कमी और माता-पिता व बुजुर्गों के प्रति घटता सम्मान: 2026 का यथार्थ)
वर्ष 2026 में हम तकनीकी रूप से अत्यंत उन्नत हो चुके हैं, परंतु सामाजिक और नैतिक मूल्यों के स्तर पर एक गंभीर चिंता उभरकर सामने आ रही है—बच्चों में संस्कारों की कमी तथा माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति आदर-सम्मान में गिरावट। यह केवल किसी एक परिवार की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। आज का बच्चा मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के बीच बड़ा हो रहा है। जानकारी उसकी मुट्ठी में है, लेकिन उसमें विवेक, सभ्यता और विनम्रता का अभाव दिखाई देता है। कई घरों में बच्चे माता-पिता से ऊँची आवाज़ में बात करना, उनकी बातों को नज़रअंदाज़ करना या बुजुर्गों की सलाह को “पुरानी सोच” कहकर टाल देना सामान्य व्यवहार मानने लगे हैं। यह स्थिति केवल बच्चों की गलती नहीं, बल्कि हमारे बदलते पारिवारिक और सामाजिक ढाँचे का परिणाम है। संस्कारों की पहली पाठशाला परिवार होती है। जब माता-पिता स्वयं समयाभाव, तनाव और डिजिटल व्यस्तता के कारण बच्चों से संवाद नहीं कर पाते, तब बच्चे मार्गदर्शन से वंचित रह जाते हैं। दूसरी ओर, विद्यालयों में शिक्षा तो दी जा रही है, परंतु मूल्य-आधारित शिक्षा और व्यवहारिक संस्कारों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा। बुजुर्ग किसी भी समाज की धरोहर होते हैं। उनके अनुभव, त्याग और संस्कार ही पीढ़ियों को जोड़ते हैं। यदि बच्चे आज उन्हें बोझ समझने लगें, तो यह आने वाले समय में सामाजिक विघटन का संकेत है। सम्मान का अभाव धीरे-धीरे संवेदनहीनता को जन्म देता है, जो परिवारों को कमजोर करता है। इस चुनौती का समाधान भी हमारे पास ही है। माता-पिता को चाहिए कि वे स्वयं आदर्श बनें, बच्चों के साथ समय बिताएँ और संवाद को प्राथमिकता दें। विद्यालयों को नैतिक शिक्षा, टीम व सहयोग भावना, एक दूसरे का सम्मान, सामूहिक गतिविधियों और सेवा भाव को पुनः केंद्र में लाना होगा। समाज को भी यह समझना होगा कि संस्कार सिखाए नहीं जाते, जीकर दिखाए जाते हैं। यदि वर्ष 2026 में हमने बच्चों को संस्कार, एक दूसरे का सम्मान चाहे वह छोटा हो या बड़ा, माता-पिता का आदर और बुजुर्गों का सम्मान सिखा दिया, तो आने वाला विकसित भारत न केवल तकनीकी रूप से, बल्कि नैतिक रूप से भी सशक्त होगा।