झाबुआ

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

हां, मैने तोडे हैं बंधन, रूढिवादी परंपराएं

यह कहानी है उस अनाथ लडकी की जिसके साथ ना माता पिता है और ना समाज जिसने शुन्य से शिखर तक का सफर अपनी हिम्मत और स्वाभिमान के दम पर तय किया। यह कहानी है उस अन्नु की जिसने अन्नु से अन्नु भाबोर बन कर जिले का नाम रोशन किया है। यह कहानी हमें सिखाती है कि परिस्थियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यो न हो इच्छाशक्ति हो तो नया रास्ता बनाया जा सकता है। अन्नु की शादी 19 साल की उम्र में एक पारंपरिक परिवार मै कर दी गई थी । उसके हाथ में अभी कॉलेज की डिग्री भी नही आई थी कि उसके हाथो में घर की चाबियाँ और रसोई का जिम्मा थमा दिया गया । अन्नु जब भी अपनी किताबें खोलती उसके घर वाले तंज कसते अब पढकर क्या कलेक्टर बनेगी । अब तो रोटिया गोल बनाना सीख वही काम आएगा। पडोस की औरते कहती शादी के बाद पढाई घर बिगाडने के लझण है ये । अक्सर अन्नु रात को सबको खिलाने के बाद रसोई की हल्की रोशनी में अपनी किताबें पढती थी। उसकी आँखो में नींद नही एक सपना था ।

अन्नु के लिये पढाई का रास्ता गुलाबो की सेज नहीं बल्कि काटो भरी पगडंडी थी । यहा उसके संघर्ष के कुछ ऐसे पल है। जिन्होने उसकी रूह को आजमाया था । अन्नु का एक छोटा सा बच्चा भी था। जब वह रात को पढाई करने बैठती तो बच्चा रोने लगता एक हाथ से पालना झुलाना और दुसरे हाथ में किताब पकड कर नोटस बनाना उसकी रोज की दिनचर्या बन गई थी। एक बार जब अन्नु की परीक्षा नजदीक थी बच्चा बीमार हो गया। पूरी रात उसे गोद मे लेकर टहलना पडा। आंखो में नींद की भारी जलन और हाथ में दवा की शीशी…… उस रात अन्नु रो पडी थी उसे लगा शायद उसे हार मान लेनी चाहिए, लेकिन अगले पल ही उसने अपनी सिसकी पोंछी ओर सोचा अगर आज में हार गई तो कल ये समाज, कई महिलाओ को इन्ही बेडियो मे जकड देगा ।

अन्नु का संघर्ष सिर्फ घर तक ही सिमीत नही था। कई सामाजीक बहिष्कार व कटाक्ष झेले है। गांव के कुए पर या मंदिर की सीढियो पर जब भी अन्नु गुजरती औरते ताना मारती देखो बडी मेम साहब चली है। घर का काम छोडकर पोथी-पतरा पढती है पति को वश में कर लिया है। यहा तक कि घर के बडे कार्यक्रमों में उसे यह कहकर किनारे कर दिया जाता कि तुम तो अपनी किताबो मे ही घुसी रहो तुम्हे क्या पता रस्म रिवाज क्या होते है। अन्नु ने इन तानो को कडे घूंट की तरह पिया पर कभी पलटकर जवाब नही दिया, उसका जवाब उसकी सफलता को देना था ।

समस्या अगर घर की व समाज तक की हो तो झेल पाना आसान था पर अब परेशानी पेसो को लेकर भी आ गई। ना पिता का सहारा ना मा का सहारा ओर ना ससुराल का अब तो मानो ईश्वर अन्नु की कडी परीक्षा ले रहा था। अब पेसो की मदद किससे लि जाय कभी खुद का स्वाभीमान सामने आये तो कभी अपने सपनो को पुरा करने को जुनुन । फिर भी अन्नु ने हिम्मत ना हारी अपनी छोटी छोटी बचत के माध्यम से अपनी पडाई को पुरा किया ।

एक दिन अन्नु ने ठान लिया की वह इस पढाई को मुर्तरूप देने के लिये परीक्षा देगी । उसके पति शुरू में चुप थे , अन्नु की मेहनत देखकर पसीज गए। उन्होने छिपकर अन्नु के लिए फार्म भरा। दिन भर घर का काम मेहमानो की खातिरदारी और संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियों एक चुनोती बन कर खडी थी। अन्नु सुबर 4 बजे उठकर पढती और रात को जब सब सो जाते तब नोटस बनाती। जब परीक्षा का परिणाम आया तो अन्नु ने पूरे जिले व घर वालो को चोका दीया था। लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी नौकरी ।

पेसो का अभाव परिवार का अभाव ओर एक अनाथ अन्नु के सामने अपने आप को साबीत करने के लिये सिर्फ एक नोकरी की जरूरत थी। अब अन्नु का दुसरा संघर्ष नोकरी की तलाश शुरू होता है । संघर्ष की स्याही जितनी काली होती है, सफलता का पन्ना उतना ही सफेद और चमकदार होता है। जिले मे अन्नु को स्कुल शिक्षा विभाग मे साझरता कार्यालय में अकाउन्टेंट पद की सरकारी नोकरी मिली। जिसकी खुशी सिर्फ उन्नु ने महसुस की अन्नु की सफलता से आज भी कई घर के सदस्य व सामाज के लोग हजम नही कर पाये। उनकी इस उपलब्धी को एक संघर्ष के रूप में स्वीकार कर के अपने रास्ते पर चलना शुरू किया अन्नु को अपने कार्यालय के सारे लोगो का पुरा सहयोग मिला ओर अन्नु को पुरे कार्यालय ने पुरे मान सम्मान के साथ स्वीकार किया और अन्नु ने भी अपनी पुरी सेवाये पुरे दिल से निभाई ओर जिले के सारे लोगो का स्नेह जिता ।

अन्नु ने उन तमाम रूढिवादी बंधनों को तोड दिया था जो कहते थे कि शादी एक औरत के सपनो का अंत है। उसने साबित कर दिया कि शादी की बाद सिंदूर माथे की शोभा तो हो सकते है लेकिन वह दिमाग की सोच ओर तरक्की की रूकावट नही बन सकता । जब सफलता मिली तो वही लोग जो उसे ताने मारते थे अब अपने बच्चो को उसके पास लाकर कहते अन्नु बिटिया हमारी लाडो को भी अपने जैसा बना दो ।

अन्नु ने मुस्कराकर बस इतना कहा –

बंघन मैने भी तोडे है, पर नफरत से नही….अपनी मेहनत और सब्र से ।

हाथो की मेंहदी अभी सूखी भी न थी कि मेने कलम थाम ली लोग कहते रहे कि मर्यादा की चौखट लांघना मना है, पर मैने उस चौखट को ही अपनी प्रगति का आधार बना लिया।

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