झाबुआ

तानाशाही और धमकी भरे‌ कार्यकाल का हुआ अंत

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झाबुआ —- जिले में लंबे समय से अपने सख्त और विवादित कार्यशैली को लेकर चर्चाओं में रही कलेक्टर का कार्यकाल आखिरकार समाप्त हुआ और उनका स्थानांतरण सिवनी हो गया ।  उनके कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक निर्णयों को लेकर कई बार जनप्रतिनिधियों, आम नागरिकों और मीडिया के बीच असंतोष देखने को मिला। बताया जाता है कि कलेक्टर की कार्यप्रणाली को लेकर कई बार “तानाशाही रवैये” के आरोप लगे। विशेष रूप से मीडिया से जुड़े लोगों ने आरोप लगाया कि खबरों के प्रकाशन पर दबाव बनाया जाता था और आलोचनात्मक खबर लिखने पर एफआईआर जैसी कार्रवाई की धमकियां भी दी जाती थी ।

पूर्व के वर्षो में हमने देखा था कि किस तरह तत्कालीन कलेक्टरो द्वारा आमजन की समस्या को सुलझाने के लिए स्वयं शहर का पैदल निरीक्षण किया था और तत्कालीन कलेक्टर चंद्र शेखर बोरकर ने तो शहर का हाट बाजार मेन बाजार में लगने से यातायात और अन्य समस्या को दृष्टिगत रखते हुए हाट बाजार मंडी में शिफ्ट कर दिया था तत्कालीन कलेक्टर प्रबल सिपाहा, आशीष सक्सेना , सोमेश मिश्रा , श्रीमती रजनीसिंह द्वारा शासन की योजनाओं को आम जन तक पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास किए और मीडिया के साथ समन्वय बनाकर योजना का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का प्रयास किया । लेकिन हाल ही में झाबुआ से सिवनी स्थानांतरित हुई कलेक्टर नेहा मीना की कार्यप्रणाली के  किस्से झाबुआ से भोपाल तक चर्चा में है

जी हां हम बात कर रहे एक ऐसे जिला प्रशासन या तत्कालीन कलेक्टर की कार्यप्रणाली की , जहां उनकी कार्य शैली से मीडिया के कई लोगों में असंतोष देखने को मिला था और इसके लेकर धरना प्रदर्शन भी हुआ था । लेकिन तत्कालीन कलेक्टर अपने एसी चेंबर से बाहर नहीं निकली  । उसके बाद तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कुचलने का कुंठित प्रयास कई बार हुआ । किसी भी जनहित के मुद्दे पर खबर या जिला प्रशासन की गैर जिम्मेदाराना कार्य प्रणाली को उजागर करने का प्रयास किया या किसी भी तरह की आलोचनात्मक खबर लिखने पर एफआईआर जैसी कारवाई की धमकी भी दी गई है और अगर कोई पत्रकार इस किसी अव्यवस्था पर सवाल उठा या खबर  प्रकाशित करें तो उस पर एफआईआर की कार्रवाई को लेकर मैसेज पहुंच जाता था । यह किस तरह का लोकतंत्र है… जहां सवाल पूछना ही अपराध बन जाए…? वहीं उनके ही जिले की छात्रावास की छात्राएं अपनी समस्या कलेक्टर को बताने के लिए करीब 15 किमी तक पैदल चलकर कलेक्टर कार्यालय पहुंची थी पूरा प्रशासन छात्रावास पहुच चुका था लेकिन छात्राओ ने अपनी समस्या कलेक्टर को ही बताने की बात कही । लेकिन कलेक्टर महोदया नहीं पहुंची और अंत छात्राओ को पैदल चलना पड़ा । विगत माह में ही गौरक्षा व हिंदुत्व के लिए लगातार प्रयास करने वाले युवक तक पर एफआईआर दर्ज की गई थी और गौमांस बेचने वाले को छूट दी गई । यह कैसी कार्य प्रणाली है ।

जब इस ट्रांसफर के बाद हमने लोगों से चर्चा की तो अधिकतर लोगों का कहना था कि ऐसा कलेक्टर हमने हमारे जीवन मे पहली बार ही देखा है। जब उनके पास अपनी समस्या बताने मिलने हेतु जाते थे, तो वे हमे घण्टो बैठाकर रखती थी । उनका यह बर्ताव उनके अधिनिष्ठ कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों के साथ कई पत्रकारों के साथ भी वैसा ही था । कुछ लोगो ने चटखारे लेते हुए कहा कि झाबुआ के इतिहास में पहली बार किसी कलेक्टर के ट्रांसफर होने पर एक साथ जनता, जन प्रतिनिधियो, कर्मचारियों, अधिकारियो और पत्रकारों तक में हर्ष की लहर दौड़ गयी है,  अब आगे तो शिवनी वाले ही जाने। नाम न बताने की शर्त पर कुछ अधिकारियों / कर्मचारीयों ने बताया कि हमारे कार्यकाल में ऐसी महिला कलेक्टर हमने देखी ही नहीं, जो सिर्फ बैठकों में हमे डांटने और लताड़ने के लिए बुलाती थीं। वही जनप्रतिनियो ने कहा कि जब हम किसी समस्या को लेकर उनसे मिलने जाते थे, वे हमें मिलने का समय ही नही देती थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासनिक सख्ती के नाम पर कई बार आम जनता की समस्याओं को नजरअंदाज किया गया, जिससे असंतोष का माहौल बना रहा। हालांकि, कुछ वर्गों ने उनके कार्यकाल में हुए विकास कार्यों की सराहना भी की है, लेकिन कुल मिलाकर उनका कार्यकाल विवादों में ही घिरा रहा। अब उनके कार्यकाल के समाप्त होने के बाद जिले में नए प्रशासन से बेहतर संवाद, पारदर्शिता और जनहित में कार्य करने की उम्मीद जताई जा रही है ।

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