पिछले साल जिस “D3” (दारू, दहेज, डीजे) मुहिम ने जिले में एक नई मिसाल कायम की थी, इस साल वही अभियान सुस्त नजर आ रहा है। गांव-गांव में फिर से देर रात तक डीजे की गूंज, शादियों में खुलेआम दारू और दहेज की चर्चाएं—सवाल उठता है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है?
नियम तो साफ हैं—शोर-शराबे पर नियंत्रण के लिए Noise पोल्लुशन (रेगुलेशन एंड कंट्रोल ) रूल्स , 2000 और दहेज पर सख्त कानून Dowry Prohibition Act, 1961 मौजूद हैं। लेकिन जमीन पर इनका असर इस बार कम क्यों दिख रहा है?
प्रशासन पर सवाल
जिले के District Collector और Superintendent of Police से यह अपेक्षा रहती है कि वे कानूनों को सख्ती से लागू करें।
पर क्या वजह है कि डीजे रात 10 बजे के बाद भी गूंजता है?
क्या कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है?
समाजसेवियों की चुप्पी
पिछले साल जिन समाजसेवियों और गांव के तड़वी-पटेल ने आगे बढ़कर इस मुहिम को सफल बनाया, इस बार उनकी आवाज उतनी बुलंद क्यों नहीं है?
क्या मुहिम सिर्फ एक साल की थी, या फिर जिम्मेदारी भी मौसमी हो गई?
सवाल
क्या “D3” अब सिर्फ पोस्टर और भाषणों तक सीमित रह गया है?
और क्या प्रशासन तब ही जागेगा जब कोई बड़ी घटना हो जाएगी?
जनता से अपील
अगर सच में बदलाव चाहिए, तो समाज और प्रशासन दोनों को साथ आना होगा—