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झाबुआ

जल संकट का मुद्दा वास्तव में जनहित का है या फिर आने वाले समय की राजनीति का नया हथियार।

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झाबुआ को जल संकट जिला घोषित करवाने की सियासत?
सवालों के घेरे में विकास, योजनाएं और नेताओं की राजनीति
झाबुआ। जिले में इन दिनों “जल संकट” को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज होती जा रही है। कहीं धरना, कहीं ज्ञापन, तो कहीं नेताओं द्वारा सरकार और प्रशासन पर आरोप लगाए जा रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर जिस जिले में करोड़ों रुपये की नल-जल योजनाएं, ग्रामीण पेयजल परियोजनाएं, तालाब गहरीकरण, हैंडपंप खनन और सिंचाई योजनाओं पर लगातार काम हुआ है, वहां अचानक “जल संकट जिला” घोषित करवाने की मांग क्यों उठ रही है?
जानकारों का कहना है कि झाबुआ कृषि प्रधान जिला है और यहां हर वर्ष फसलों का रकबा भी लगातार बढ़ रहा है। किसान मक्का, सोयाबीन, गेहूं और अन्य फसलों की खेती बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। यदि स्थिति इतनी भयावह होती, तो खेती का विस्तार कैसे संभव होता? यही प्रश्न अब आमजन के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार द्वारा गांव-गांव तक नल-जल योजना पहुंचाने, टैंकर व्यवस्था, पाइपलाइन विस्तार और जल संरक्षण कार्यों पर करोड़ों खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद कुछ नेता लगातार जल संकट को राजनीतिक मुद्दा बनाकर अपनी सक्रियता दिखाने में लगे हैं। लोगों का आरोप है कि कहीं यह “जनहित” से ज्यादा “राजनीतिक हित” का मामला तो नहीं?
सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि यदि कहीं स्थानीय स्तर पर पानी की समस्या है तो उसका समाधान प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को मिलकर करना चाहिए, लेकिन पूरे जिले की छवि “जल संकटग्रस्त” बताना विकास कार्यों और जिले की प्रतिष्ठा दोनों को प्रभावित कर सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जल संरक्षण को लेकर जनता की भागीदारी जरूरी है। केवल बयानबाजी या राजनीतिक मंचों से आरोप लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि जल स्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन और योजनाओं की निगरानी पर गंभीरता से काम किया जाए।
अब देखने वाली बात यह होगी कि जल संकट का मुद्दा वास्तव में जनहित का है या फिर आने वाले समय की राजनीति का नया हथियार। जिले की जनता जवाब चाहती है कि आखिर विकास और योजनाओं के दावों के बीच “जल संकट” की तस्वीर पेश करने के पीछे असली मंशा क्या है?

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