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झाबुआ

गरीब बच्चों के बीच जन्मदिन मनाना अच्छी पहल, लेकिन दिखावे और फोटोशूट से बचना भी जरूरी

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झाबुआ। -समाज में जरूरतमंदों की मदद करना, गरीब बच्चों के साथ खुशियां बांटना और उनके चेहरों पर मुस्कान लाना निश्चित रूप से एक सराहनीय पहल है। जिले में कई बार देखने में आता है कि संपन्न परिवारों के सदस्य और उच्च पदों पर आसीन अधिकारी अपने बच्चों या परिवारजनों का जन्मदिन शासकीय स्कूलों और आश्रमों में मनाते हैं। इस दौरान बच्चों के साथ केक काटा जाता है, उन्हें भोजन कराया जाता है और कार्यक्रम की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की जाती हैं। हालांकि, इस तरह के आयोजनों में सेवा की भावना के साथ बच्चों के आत्मसम्मान और उनकी संवेदनाओं का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है।
सेवा के नाम पर कहीं बच्चों को उनकी गरीबी का एहसास तो नहीं कराया जा रहा?
सवाल यह है कि क्या किसी जरूरतमंद बच्चे के साथ खुशियां बांटने का उद्देश्य उसकी जिंदगी में खुशी लाना है या फिर अपनी सामाजिक छवि को चमकाना? जब किसी आयोजन की तस्वीरों और वीडियो को सोशल मीडिया पर इस तरह प्रचारित किया जाता है कि संबंधित व्यक्ति की छवि एक बड़े समाजसेवी के रूप में उभरकर सामने आए, तो सेवा की मूल भावना पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
गरीब और जरूरतमंद बच्चों के बीच जन्मदिन मनाना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन आयोजन के दौरान उनकी गरिमा, निजता और आत्मसम्मान का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। बच्चों को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि वे किसी की आर्थिक हैसियत के मुकाबले कमजोर हैं या किसी की दया पर निर्भर हैं।
सादगी से मनाएं जन्मदिन, प्रचार से बनाएं दूरी
यदि कोई परिवार अपने बच्चे का जन्मदिन किसी शासकीय स्कूल या आश्रम में मनाना चाहता है, तो आयोजन सादगीपूर्ण होना चाहिए। बच्चों के साथ खुशियां बांटने के लिए भव्यता, दिखावे और प्रचार की आवश्यकता नहीं है। बच्चों को उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराना, उनकी जरूरतों को समझना और उनकी शिक्षा में सहयोग करना भी सेवा के सार्थक तरीके हो सकते हैं । वही बहुत से लोग मीडिया में वाहवाही लूटने के लिए बच्चों को खाना परोसते या अपने हाथों से खाना खिलाते हुए फोटो सोशल मीडिया पर वायरल करते हैं और आप अपने आप को समाजसेवी बताने का प्रयास करते हैं ।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे आयोजनों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने से पहले बच्चों की निजता और सहमति का ध्यान रखा जाए। किसी बच्चे की गरीबी या मजबूरी को सार्वजनिक प्रदर्शन का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
समाजसेवा की पहचान पोस्ट से नहीं, संवेदना से होती है
वास्तविक समाजसेवा वह है, जिसमें मदद पाने वाले व्यक्ति को सम्मान का अनुभव हो, न कि हीनभावना का।       

सेवा का उद्देश्य जरूरतमंदों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना होना चाहिए, न कि अपनी प्रशंसा करवाना।


समाज के संपन्न वर्ग और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से अपेक्षा है कि वे बच्चों के बीच खुशियां बांटते समय संवेदनशीलता और सादगी को प्राथमिकता दें। आखिरकार, किसी बच्चे के चेहरे पर मुस्कान लाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उसे अपनी गरीबी नहीं, बल्कि अपनेपन का एहसास कराया जाए । क्योंकि सच्ची सेवा वह नहीं, जिसका सबसे अधिक प्रचार हो, बल्कि वह है, जिससे किसी जरूरतमंद का आत्मसम्मान बना रहे।

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