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झाबुआ

धर्म के प्रति आस्था व श्रद्धा रहे मजबूत : अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण

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गुजरात – कोबा, गांधीनगर –  : कोबा स्थित प्रेक्षा विश्व भारती में वर्ष 2025 के चतुर्मास के लिए विराजमान हो चुके, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में अब देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु चतुर्मास का लाभ उठाने के लिए पहुंच गए हैं। सभी इस अवसर का पूर्ण आध्यात्मिक लाभ उठाने के लिए गुरु सन्निधि में पहुंच रहे हैं। अहमदाबादवासी तो अपने ही नगर में अपने आराध्य को पाकर पुलकित-प्रफुल्लित हैं। आचार्यश्री की अमृतमयी वाणी का लाभ उठाने को जन-जन उमड़ रहा है।

शुक्रवार को ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में समुपस्थित श्रद्धालु जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि मानव जन्म मिलना बहुत अच्छी और ऊंची बात होती है। मानव जन्म भी धार्मिक परिवार और माहौल में होना और अच्छी बात हो जाती है। धर्म के विषय में जानकारी मिल जाए और आदमी धर्म को स्वीकार भी कर ले और किसी कर्म के उदय से धर्म को छोड़कर भोग प्रधान जीवनशैली वाला आदमी अभागा होता है। धर्म के प्रति आस्था, नियम और त्याग रखने का प्रयास होना चाहिए। त्याग में कभी कोई कमी हो सकती है, किन्तु धर्म के प्रति आस्था कमजोर न पड़े, ऐसा प्रयास होना चाहिए। वह आदमी मूर्ख ही होता है, जो कल्पवृक्ष को ऊखाड़ धतूरे का पौधा लगाता हो, कोई चिंतामणि रत्न से कौवे को भगाता हो और जो श्रेष्ठ हाथी को बेचकर गदहा खरीदता हो। ये मनुष्य जिस प्रकार बुद्धिहीन होते हैं, उसी प्रकार वह आदमी भी बुद्धिहीन ही होता है तो धर्म के मार्ग का परित्याग कर भोग के रास्ते पर बढ़ जाता है। मनुष्य जन्म मिलना और और उसमें धर्म का प्राप्त हो जाना बहुत भाग्य की बात होती है। आदमी को देव, गुरु और धर्म के प्रति सतत जागरूक और श्रद्धानिष्ठ बने रहना चाहिए। जीवन में कोई कठिनाई आ जाए और कोई धर्म को छोड़ दे तो बड़ी नासमझी वाली बात और गलत चिंतन है। कठिनाई का मूल कारण आदमी का पुराना कर्म होता है। कठिनाई में भी आदमी को धर्म में आस्थावान बने रहना चाहिए। किसी का व्यापार बंद हो जाए, कभी कोई दुर्घटना हो जाए, कहीं अपमान हो जाए, कहीं कोई चोरी हो जाए तो ये सारी भौतिक विपत्तियां होती हैं, इनसे घबराकर धर्म को छोड़ने का विचार भी नहीं आना चाहिए। यदि किसी मानव को साधुपना प्राप्त हो जाए तो कितनी अच्छी बात होती है। आदमी को जितना संभव हो सके, अपने धर्म के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थ जीवन में पैसे की आवश्यकता होती है तो उसमें यह विवेक रहे कि किसी को ठगने, किसी के साथ धोखाधड़ी करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। चाहे आदमी दुकानदार हो या ग्राहक दोनों में धोखे की वृत्ति न हो। उपासनात्मक धर्म तो धर्मस्थान में होते हैं, किन्तु ईमानदारी, सत्य, प्रमाणिकता रहे तो जीवन में हर क्षण धर्म साथ रह सकता है। आदमी को किसी के विषय में झूठ बोलने से बचने का प्रयास करना चाहिए। जितना संभव हो सके, धर्म, साधना आदि करते रहने का प्रयास करना चाहिए। धर्म के प्रति आस्था, श्रद्धा मजबूत रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त मुनि राजकुमारजी ने गीत का संगान किया। मुनि मदनकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

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