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झाबुआ

त्रिशला नंदन वीर की -जय बोलो महावीर की ….नारे से गुंजा झाबुआ शहर

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झाबुआ – महापर्व पर्युषण के पांचवें दिन स्थानीय श्री ऋषभदेव बावन जिनालय के पौषध भवन में कल्पसूत्र जी का वाचन परम पूज्य साध्वी भगवत रत्न रेखा श्री जी, अनुभवदृष्टा श्रीजी, कल्पदर्शिता श्री जी के पावन सान्निध्य में सतत जारी है। कल रविवार को महावीर प्रभु का जन्म वाचन समारोह स्थानीय मूर्ति पूजक संघ के श्रावक–श्राविकाओं ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर मनाया। केसरिया रंग के छापे लगाए गए। माता त्रिशला रानी के 14 सपनो की बोली लेने वाले लाभार्थियों ने सपनो के चांदी के प्रतीक अपने सिर के ऊपर धारण कर जुलूस में शामिल हुए।


तिलक लगाने का अर्थ वीतराग प्रभु की आज्ञा को शिरोधार्य करना..
परम पूज्य साध्वी भगवत अनुभव दृष्टा श्री जी ने मस्तक पर तिलक लगाने के महत्व को समझाते हुए एक दृष्टांत के माध्यम से बताया कि पाटन के राजा अजय पाल ने अपने राज्य के मंत्रीश्वर को कपाल पर केसर तिलक नही लगाकर आने हेतु आदेश जारी किया था। इस पर समाज के सभी श्रावकों की एक बैठक विचार विमर्श हेतु आयोजित की गई। जिसमे निर्णय लिया गया कि राजा के इस आदेश की अवज्ञा की जाएगी। अगले दिन श्रावकों को दंड स्वरूप उबलते तेल के कढाव में कूदना साथ ही 21 श्रावक जोड़े सहित ने उबलते हुए तेल में अपनी प्राण की आहुति दे दी। जब आगे मंत्रीश्वर की बारी आयी ,तो राजा ने खुद आगे आकर उन्हें रोक कर बोले की तुम्हारी विजय हुई। इस तरह से सत्य परेशान हो सकता है,किंतु पराजित नहीं यह कहावत चरितार्थ हुई। जैन आगमों में तिलक लगाने का अर्थ वीतराग प्रभु की आज्ञा को शिरोधार्य करना प्रतिपादित किया गया है ।


दोपहर में सामूहिक स्वामीवात्सल्य का आयोजन किया । प्रभुजी की अंग रचना करने का सुझाव.. परम पूज्य साध्वी भगवंत श्री कल्पदर्शिता जी ने नमस्कार महामंत्र को सुमधुर स्वर के साथ गाकर श्रवण करवाया। उपस्थित समाज जन मंत्र मुग्ध हो उठे। प्रभु की आंगी रचना कब से और कैसे प्रारंभ हुई…? इस तथ्य पर साध्वी भगवत ने बताया कि मंदिरों में पूर्व काल में श्रावक श्राविकाओं की संख्या प्रभु दर्शन के लिए शने– शने कम होने लगी थी, तो आचार्य भगवंत ने प्रभुजी की अंग रचना करने का सुझाव दिया था। फल स्वरुप यह प्रथा आज तक निरंतर रूप से जारी है, जिससे श्रावकों में धर्म भावना में अभिवृद्धि हुई। 8 उपवास के दस से अधिक तपस्वियों ने एवं 200 से अधिक आयंबिल एकाशना के तपस्वियों ने पूज्य साध्वीजी से प्रत्याख्यान लिए व्याख्यान का संकलन अशोक जैन द्वारा किया गया और मीडिया प्रभारी रिंकू रुनवाल द्वारा जानकारी दी गई।

जन्म वाचन के पश्चात भव्य रथ यात्रा निकाली गई….
पुज्य साध्वी जी ने भगवान महावीर स्वामी जी का जन्म वाचन विजय मुहूर्त 12.39 पर किया। जैसे ही जन्म वाचन हुआ वैसे ही लाभार्थी निर्मल मेहता परिवार द्वारा थाली डंका बजाकर जन्मोत्सव की सूचना दी गई साथ ही पालना जी के लाभार्थी परिवार ने पालने को झुलाया। प्रमोद भंडारी परिवार ने14 स्वप्ना जी को बधाकर लाभार्थी परिवार को प्रदान किए।अनिल रुनवाल ने केसरिया छापे लगाने का लाभ लिया।

भव्य रथ यात्रा प्रारंभ हुई..
जन्मोत्सव बाद श्री ऋषभदेव भवन जिनालय से भगवान महावीर स्वामी जी की भव्य रथयात्रा प्रारंभ हुई। जिसमें भगवान को रथ में लेकर मांगुबेन शांतिलाल सकलेचा बैठी थी। भगवान के सारथी के रूप में तपस्वी निशान शाह बैठे थे,रथ यात्रा में सबसे पहले श्रावक वर्ग चल रहे थे। उसके पश्चात भगवान का रथ और उसके पश्चात साध्वी जी और साथ में 14 सपना जी सिर पर रखकर लाभार्थी श्राविका चल रही थी। युवाओं द्वारा भगवान महावीर स्वामी के जय जयकार लगाए जा रहे थे जगह जगह समाजजनों ने अक्षत श्रीफल से भगवान के सम्मुख गहुली की गई। रथयात्रा रूनवाल बाजार,थांदला गेट, मेन मार्केट,राजवाड़ा से होते हुए पुनः बावन जिनालय पहुंची।

आरती उतारी गयी..
मूलनायक भगवान की आरती आनंदीदेवी लक्ष्मीचंद जी नेताजी परिवार,श्री केसरियानाथ भगवान की आरती राजेन्द्र रुनवाल परिवार ,मुनिसुव्रत स्वामी भगवान की आरती अशोक राठौर परिवार,महावीर स्वामी जी की महाआरती श्रीमती मांगूबेन शांतिलाल सकलेचा परिवार,मनोज वागमलजी कोठारी परिवार ने मंगल दिवा, गुरुदेव एवं मणिभद्र जी, नमस्कार महामंत्र की आरती उल्लास उमंग जैन परिवार, गौतम स्वामी जी की आरती सूर्यप्रकाश कोठारी परिवार द्वारा उतारी गई।आरती के पश्चात पंजेरी की प्रभावना श्यामूबाई रतनलाल मुकेश रूनवाल परिवार ने वितरित की।

सोने एवं चांदी की वर्क से प्रभुजी की अंग रचना की गई…
भगवान महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक वाचन के अवसर पर कल श्री जिनालय के मूल नायक आदि नाथ भगवान,केसरियानाथ जी और भगवान महावीर स्वामी जी की स्वर्ण एवं चाँदी के बरक से सुंदर अंगरचना कर सजावट की गई। साथ ही युवाओं ने पूरे जिनालय को दीपक से सजाया था और शाम को प्रतिक्रमण के पश्चात प्रभु जी की भाव सहित भक्ति की गई।

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