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झाबुआ

कोट की आरती के साथ हुआ सांझी उत्सव का समापन।

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झाबुआ —–कोट की आरती के साथ हुआ सांझी उत्सव का समापन।
नगर के हृदय स्थल में विराजित प्रभु श्री गोवर्धननाथजी की हवेली में
16 दिवसीय दान लीला व सांझी उत्सव का समापन आश्विन कृष्ण चतुर्दशी कोट की आरती के साथ हुआ । आश्विन कृष्ण पंचमी से प्रतिदिन सायं काल ठाकुर जी के सम्मुख विविध लता, पत्र व पुष्पों से सुंदर-सुंदर सांझी बनाई गई। जिसमें ठाकुर जी की ब्रज में हुई विभिन्न लीलाओं का चित्रांकन किया गया। इसमें प्रमुख रूप से यमुना किनारे स्थित विश्राम घाट, नंदगांव-बरसाना, दानघाटी, कुसुम सरोवर, श्री गिरिराज जी, श्री यमुना जी,
चीरघाट- कदंबखंडी,
बंसीवट – रासचौतरा,
सांझी उत्सव के अंतिम दिन ठाकुर जी को मनोहारी बगीचे में विराजमान करके प्रभु सम्मुख
क्षीर सागर – शेषशायी,
किला कोट, फूलों की सांझी,
रंग की सांझी, सूखे मेवे की सांझी बनाई गई और ठाकुर जी व सांझी को भोग धरकर आरती उतारी गई। इस अवसर पर सांझी के सुंदर-सुंदर पदों का गायन कीर्तनीय मंडली द्वारा किया गया। समस्त वैष्णव जनों ने इस दिव्य मनोहारी बगीचे में विराजमान ठाकुर जी के दर्शनों का लाभ लिया।
पुष्टिमार्ग में सांझी उत्सव का महत्व
वर्तमान में जिस प्रकार कुंवारी बालिकाएं संझा बनाती है ठीक उसी प्रकार प्राचीन समय में ब्रज की गोपांगनाएं प्रभु श्री कृष्ण के सम्मुख कुंज निकुंज में ठाकुर जी को रिझाने के लिए विविध पत्तों पुष्पों से सांझी बनाती थी। श्री राधाजी एवं उनकी सखियां
वनों में जाकर सुंदर-सुंदर विविध पत्र पुष्प तोड़कर लाकर प्रभु की अनेक लीलाओं का उन पुष्पों से चित्रांकन करती थी। इस सुंदर लीला को पुष्टि मार्ग में सांझी उत्सव के रूप में मनाते हैं
पुष्टिमार्गीय हवेलियों में आज भी ब्रज की गोपांगनाओं की भांति इन दान के (श्राद्धके) के दिनों में सायं काल पत्र पुष्पों से सुंदर सांझी ठाकुर जी के सम्मुख बनाई जाती है व चतुर्दशी को समापन पर ठाकुर जी को बगीचे में पधरा कर उनके सम्मुख विभिन्न प्रकार की सांझी बना भोगधर आरती की जाती है।
इस प्रकार यह दस दिवसीय सांझी उत्सव मनाया जाता है।

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