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झाबुआ

36 सालों से रावण दहन में मुस्लिम कलाकार, इंसानियत और भाईचारे का संदेश

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थांदला: भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सांप्रदायिक सौहार्द की जीवंत मिसाल झाबुआ-आलीराजपुर अंचल में हर साल दशहरा पर देखने को मिलती है। यहां एक मुस्लिम परिवार पिछले 36 वर्षों से रावण का पुतला तैयार कर रहा है और हिंदू परंपरा को अपनी कला और मेहनत से संजो रहा है।

थांदला के आबिद हुसैन गोरी बताते हैं कि वे 1989 से लगातार रावण का पुतला बना रहे हैं। इससे पहले उनके पिता मोहम्मद बा यह जिम्मेदारी निभाते थे। पिता के निधन के बाद आबिद ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इसे और भी बेहतर रूप दिया। नगर पालिका और परिषद द्वारा जारी टेंडर में हर बार यह जिम्मेदारी उन्हें ही दी जाती है।

इस वर्ष भी आबिद और उनकी टीम झाबुआ और आलीराजपुर के पांच स्थानों— आलीराजपुर, जोबट, आजादनगर, पलासडी और राणापुर—में रावण के पुतले तैयार कर रहे हैं।

आबिद हुसैन कहते हैं,
“बचपन से मुझे इस काम का शौक था। जब पिताजी पुतला बनाते थे, मैं पास बैठकर उन्हें देखता और मदद करता। धीरे-धीरे यह हुनर मैंने भी सीख लिया। अब खुद पुतला तैयार करना मेरे लिए गर्व और आनंद का अनुभव है। यह काम सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का प्रतीक है।”

दशहरा के दिन जब उनके हाथों से बना रावण जलाया जाता है, वहां उमड़ती भीड़ में एक अनकही परंतु गहरी संदेश गूंजती है— त्योहार केवल धार्मिक मान्यता का प्रतीक नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का जरिया भी होते हैं।

यह परंपरा स्पष्ट करती है कि भारतीय संस्कृति की ताकत उसकी एकता और विविधता में है। जहां धर्म और मज़हब की दीवारें टूटकर इंसानियत और भाईचारे की मिसाल कायम करती हैं।

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