आरटीआई का बनाया मजाक! जानकारी देने के बजाय नियमों का हवाला
32 साल पुराने रिकॉर्ड का हवाला, मेडिकल दस्तावेजों को बताया व्यक्तिगत जानकारी
झाबुआ —– सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत जब नागरिक जानकारी मांगते हैं, तो उनसे यह अपेक्षा रहती है कि विभाग नियमानुसार स्पष्ट और बिंदुवार जवाब देगा। लेकिन झाबुआ जिले के जनजातीय कार्य विभाग से जुड़ा एक मामला चर्चा में है, जिसमें नियुक्ति से संबंधित जानकारी मांगने पर विभाग ने पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने और मेडिकल दस्तावेज व्यक्तिगत जानकारी होने का हवाला दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी का स्पष्ट जवाब देना विभाग की जिम्मेदारी नहीं है…? वही सहायक आयुक्त द्वारा नियुक्ति से संबंधित जानकारी को निजी जानकारी का हवाला देकर , इस कानून का मजाक बनाने का प्रयास किया जा रहा है जो चिंतनीय है ।
नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों की मांगी थी जानकारी ।
प्राप्त दस्तावेज के अनुसार किसी आवेदक द्वारा 1 अक्टूबर 2026 को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 6(1) के तहत आवेदन प्रस्तुत किया । झाबुआ बीईओ से संबंधित नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं ।
नियुक्ति आदेश की प्रति ।
नियुक्ति समय मेडिकल बोर्ड का प्रमाण पत्र ।
सेवा पुस्तिका की प्रति ।
सेवा में रहते हुए , प्राप्त किए गए लाभ की प्रति
प्रमोशन आदेश की प्रति । इस पर कार्यालय कलेक्टर, जनजातीय कार्य विभाग, जिला झाबुआ ने 15 अक्टूबर 2026 को पत्र जारी कर अपना जवाब दिया। विभाग ने जवाब में बताया कि संबंधित नियुक्ति से जुड़े लगभग 32 वर्ष पुराने रिकॉर्ड कार्यालय में उपलब्ध नहीं हैं। वहीं, नियुक्ति के समय मेडिकल बोर्ड के प्रमाण पत्र एवं मेडिकल रिपोर्ट के संबंध में सूचना को व्यक्तिगत जानकारी बताते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) का उल्लेख किया गया। पत्र में तीसरे पक्ष से संबंधित जानकारी और आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने की सहमति से जुड़ी स्थिति का भी हवाला दिया गया है ।
रिकॉर्ड नहीं तो उसके संरक्षण पर सवाल
मामले में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि विभाग के पास नियुक्ति से संबंधित पुराने अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं, तो क्या उनकी अनुपलब्धता के कारणों को स्पष्ट किया गया है? क्या रिकॉर्ड की उपलब्धता की जांच की गई और क्या अभिलेखों के रखरखाव से संबंधित स्थिति आवेदक को बताई गई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है। वहीं, मेडिकल रिपोर्ट जैसे दस्तावेज व्यक्तिगत जानकारी की श्रेणी में आ सकते हैं या नहीं… चूंकि नियुक्ति के समय के दस्तावेज मांगे गए हैं संभवतः निजी जानकारी की श्रेणी में नहीं आते है लेकिन आरटीआई आवेदन में मांगी गई प्रत्येक सूचना पर उसके तथ्यों और कानूनी प्रावधानों के अनुसार अलग-अलग विचार किया जाना चाहिए। यदि कुछ जानकारी देने से छूट प्राप्त है, तो अन्य ऐसी जानकारी, जिसे कानूनी रूप से उपलब्ध कराया जा सकता है, उसके संबंध में भी निर्णय लिया जाना चाहिए।
पारदर्शिता के उद्देश्य पर उठे सवाल
सूचना का अधिकार नागरिकों को सरकारी कामकाज से जुड़े रिकॉर्ड प्राप्त करने का वैधानिक माध्यम देता है। ऐसे में यदि जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो उसके कारण स्पष्ट किए जाने चाहिए और यदि किसी सूचना को देने से इनकार किया जाता है, तो उसके लिए लागू कानूनी आधार बताया जाना चाहिए। सिर्फ नियमों का हवाला देना पर्याप्त है या प्रत्येक बिंदु पर स्पष्ट जवाब देना भी जरूरी है? यही इस मामले का अहम सवाल है। अब प्रथम अपील का विकल्प यदि आवेदक विभाग के जवाब से संतुष्ट नहीं है, तो वह सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 19(1) के तहत प्रथम अपील कर सकता है। अपील में रिकॉर्ड की अनुपलब्धता, मेडिकल दस्तावेजों से संबंधित निर्णय तथा मांगी गई अन्य सूचनाओं पर बिंदुवार जवाब नहीं मिलने के मुद्दे उठाए जा सकते हैं। प्रथम अपीलीय अधिकारी इन बिंदुओं की समीक्षा कर सकता है। अब देखना होगा कि प्रथम अपील के माध्यम से मांगी गई जानकारी को लेकर स्थिति स्पष्ट होती है या नहीं। फिलहाल, यह मामला सरकारी रिकॉर्ड की उपलब्धता, सूचना के अधिकार के प्रभावी क्रियान्वयन और विभागीय जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े करता है।
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