झाबुआ – तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमधिशास्ता आचार्य महाश्रमणजी के शिष्य मुनि कोमलकुमार और मुनि सिद्धार्थकुमार के सानिध्य में शहर के राजगढ़ नाका स्थित गोड़ी पार्श्वनाथ मंदिर में रविवार को ‘मालवा स्तरीय विराट तेरापंथी श्रावक-श्राविका सम्मेलन’ का आयोजन किया गया । इस श्रावक श्राविका सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य है तेरापंथ धर्मसंघ हमारा है और हम संघ के है तथा संघ के प्रति श्रावक के क्या दायित्व है ।
सम्मेलन का शुभारंभ मुनि कोमलकुमारजी ने ‘नमस्कार महामंत्र’ के जाप के साथ किया । सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में विकास पितलिया अहमदाबाद उपस्थित थे । साथ ही अतिथि के रूप में अहमदाबाद से उपासक अरविंद डोसी , राकेश श्रीपानी , मनीष चौपड़ा भी उपस्थित थे । तेरापंथ सभा अध्यक्ष मितेश गादीया ने स्वागत भाषण दिया । तेरापंथ महिला मंडल ने मंगलाचरण की प्रस्तुति दी । तेरापंथ महिला मंडल अध्यक्ष मीना गादीया ने अपनी भावनाएं व्यक्त की । बाद में ज्ञानशाला के नन्हे बच्चों ने नृत्य के माध्यम से ज्ञानवर्धक प्रस्तुति दी । अपने प्रेरणादायी प्रवचन में मुनि कोमल कुमार जी ने कहा कि एक सच्चा श्रावक देव, गुरु और धर्म के प्रति पूर्ण समर्पित होना चाहिए। उन्होंने गुरु के प्रति कर्तव्य, गुरु की आज्ञा का पालन और सेवा को श्रावक का सच्चा धर्म बताया। तेरापंथ धर्मसंघ के सिद्धांतों के अनुरूप श्रावकों के संघ-प्रति कर्तव्यों को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया । श्रावक केवल धार्मिक अनुयायी ही नहीं, बल्कि संघीय मर्यादा और परंपराओं के सक्रिय संवाहक भी बने । संघ द्वारा बताए गए प्रमुख कर्तव्यों में आचार्य और धर्मसंघ के प्रति अटूट श्रद्धा, संघ के निर्णयों एवं अनुशासन का पालन, अणुव्रत-सामायिक जैसे नियमों का नियमित अभ्यास तथा साधु-साध्वी भगवंतों के प्रति विनम्र सेवा प्रमुख हैं। इसके साथ ही सही आचरण द्वारा समाज में संघ की श्रेष्ठ छवि बनाए रखना प्रत्येक श्रावक का महत्वपूर्ण दायित्व माना गया है। मुनिश्री ने यह भी बताया कि श्रावक को ज्ञानार्जन, स्वाध्याय और संघीय विचारधारा के प्रसार में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। बच्चों और परिवारजनों को नैतिक एवं आध्यात्मिक संस्कार देना भी आवश्यक कर्तव्य में शामिल है। इसी के साथ संघीय योजनाओं एवं सामाजिक कल्याणकारी गतिविधियों — जैसे नशामुक्ति, शिक्षा , प्रेक्षाध्यान , जीवन विज्ञान आदि प्रयोगों को जीवन में उतारने की बात कही । परिवारजनों को तेरापंथ के सिद्धांतों व मर्यादाओं के अनुरूप जीवन हेतु प्रेरित करना । श्रावक को देव , गुरु और धर्म के प्रति समर्पित होकर उनके बताए मार्ग पर चलना चाहिए । वही बच्चों में नैतिकता, अहिंसा और आध्यात्मिकता के संस्कार विकसित करना भी श्रावक का प्रमुख कर्तव्य है ।तेरापंथ का मूल मंत्र “एक आचार्य—एक आचार—एक विचार” को आत्मसात करते हुए, श्रावकों को आचार्य आज्ञा को सर्वोपरि मानकर जीवन में संयम, सादगी और सेवा भाव को अपनाने की बात कही । मुनिश्री ने बताया कि श्रावक का कर्तव्य है कि वह आचार्य की आज्ञा को सर्वोपरि माने और उसी मार्ग पर चले ।
मुनि सिद्धार्थकुमारजी ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए जैन धर्म के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डाला। इस दौरान अहमदाबाद से आए मुख्य वक्ता विमल पितलिया ने श्रावक जीवन की आचार संहिता और कर्तव्यों पर विस्तार से चर्चा की। आपने बताया कि जैसे मालवा में तीन अक्षर होते हैं वैसे ही श्रावक के भी तीन अक्षर होते हैं श्र- श्रृद्धा , व – विवेक , क- कर्तव्य है । अर्थात हमें गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव रखना चाहिए , साथ ही आचरण में विवेक और विनय होना चाहिए और संघ के प्रति कर्तव्यों का पालन करना चाहिए । वही उपासक पंकज कोठारी ने ‘श्रावक निष्ठापत्र’ का वाचन किया । मालवा कल्याण समिति अध्यक्ष संजय गांधी, मंत्री अरूण श्रीमाल , पेटलावद सभा से फूलचंद कांसवा , महासभा प्रभारी दिलीप भंडारी आदि ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त की ।
सम्मेलन में मालवा के विभिन्न अंचलों से बड़ी संख्या में समाजजन शामिल हुए, जिनमें दाहोद, रतलाम, इंदौर, थांदला, पेटलावद, बामनिया, रायपुरिया, करवड़, सारंगी, राणापुर, उदयगढ़, बोरी, केसुर, कल्याणपुरा और झकनावदा के श्रावक-श्राविकाएं प्रमुख रूप से शामिल थे। मालवा कल्याण समिति के अध्यक्ष संजय गांधी और मंत्री अरुण श्रीमाल सहित समाज के कई गणमान्य नागरिक भी उपस्थित रहे।
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