भारत की संस्कृति में नाबालिग बालिकाओं को देवी का स्वरूप माना गया है। कन्या पूजन, दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में बालिकाओं की आराधना—ये सब हमारी परंपरा के प्रतीक हैं। हम कहते हैं “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः”, परंतु यह कथन आज के समाज में खोखला प्रतीत होने लगा है। एक ओर पूजा और सम्मान के शब्द, तो दूसरी ओर नाबालिग बालिकाओं के साथ आए दिन हो रही घटनाएँ— छेड़छाड़, बलात्कार, हत्या, साइबर बुलिंग, साइबर स्टॉकिंग, ऑनलाइन यौन शोषण, धमकी, ब्लैकमेलिंग और अन्य लैंगिक अपराध—हमारे सामाजिक चरित्र पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
वर्तमान समय का यह विरोधाभास अत्यंत पीड़ादायक है। जिन नन्हीं बालिकाओं को स्नेह, शिक्षा और संस्कारों की छाया में पनपना और सुरक्षित रहना चाहिए, वही बालिकाएँ आज घर, स्कूल, रास्ते और यहाँ तक कि परिचितों के बीच भी असुरक्षित महसूस कर रही हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अनेक मामलों में अपराधी कोई अजनबी नहीं, बल्कि परिवार, पड़ोस या भरोसे के दायरे का ही व्यक्ति होता है। भय, शर्म और सामाजिक बदनामी के डर से बालिकाएँ और परिवार अक्सर चुप रह जाते हैं, और यही चुप्पी अपराध को बढ़ावा देती है।
इन घटनाओं के पीछे अनेक कारण छिपे हैं। परिवारों में संवाद की कमी, बच्चों पर पर्याप्त ध्यान न देना, असंवेदनशील सामाजिक माहौल, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर उपलब्ध अश्लील सामग्री, तथा नैतिक मूल्यों का क्षरण—ये सभी मिलकर इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।
कानूनी स्तर पर भारत में “पोक्सो अधिनियम, 2012” जैसे सख्त कानून मौजूद हैं, फिर भी घटनाओं में कमी न आना यह दर्शाता है कि केवल कानून पर्याप्त नहीं है। कानून का प्रभाव तभी होगा जब उसका सही और त्वरित क्रियान्वयन हो, पीड़िता को शीघ्र न्याय मिले और दोषियों को कड़ी सजा दी जाए। साथ ही, सरकार को स्वयं के साथ-साथ पुलिस, न्याय व्यवस्था और बाल संरक्षण संस्थाओं को और अधिक संवेदनशील व जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है।
इस गंभीर समस्या का समाधान समाज के हर स्तर पर प्रयास से ही संभव है। सबसे पहले परिवार को अपनी भूमिका समझनी होगी। माता-पिता को बालिकाओं से खुलकर संवाद करना चाहिए, उन्हें अच्छे-बुरे स्पर्श की जानकारी देनी चाहिए और यह भरोसा दिलाना चाहिए कि किसी भी असुविधा या भय की स्थिति में वे बिना डरे अपनी बात रख सकती हैं। विद्यालयों में काउंसलिंग, लैंगिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा और आत्मरक्षा प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
मीडिया और समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। अपराध की सनसनीखेज प्रस्तुति के बजाय जागरूकता और संवेदनशीलता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। समाज को पीड़िता को दोष देने की मानसिकता से बाहर आना होगा और अपराधी के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा होना होगा।
अंततः, नाबालिग बालिकाओं की सुरक्षा केवल सरकार या कानून की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक समाज बालिकाओं को सम्मान, सुरक्षा और समानता का अधिकार नहीं देगा, तब तक विकास एवं पूजा का दावा अधूरा रहेगा। सच्ची पूजा वही है, जहाँ हर बालिका सुरक्षित, सम्मानित और निर्भय होकर जीवन जी सके। इस नववर्ष 2026 में हम सभी यह शपथ ले कि किसी भी नाबालिग बालिकाओं के साथ ऐसी घटना कारित नहीं होने देंगे। यही सच्चा चिंतन और सच्ची मानवता है।
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