झाबुआ – आचार्य श्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष को गुरूदेव आचार्य श्री महाश्रमणजी ने अनुयायियों को जप , तप और त्याग के माध्यम से मनाने की बात कही । और इसी कड़ी में तेरापंथ समाज के धर्मनिष्ठ श्रावक पंकज कोठारी के उठाई तप पूर्ण करने पर, समाजजन ने शाल, माला पहनाकर व धार्मिक ग्रंथ भेंटकर तपस्वी के तप की अनुमोदना की ।
तेरापंथ समाज के सक्रिय श्रावक पंकज कोठारी विगत कई वर्षों से आयंबिल तप , अठाई तप , तैला व उपवास आदि तप निरंतर कर रहे हैं । इसी कड़ी में शनिवार शाम को तप अनुमोदना कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत शनिवार की सामायिक व नमस्कार महामंत्र के साथ हुई । सभा अध्यक्ष मितेश गादीया ने बताया कि तेरापंथ महासभा सदस्य व सुश्रावक पंकज कोठारी वर्ष 2009 से प्रतिवर्ष अट्ठाई तप कर रहे हैं और वर्ष 2025 तक लगातार यह तप किया हैं और अब तक 17 अठ्ठाई तप कर चुके हैं । इसके अलावा 2016 से प्रतिवर्ष नवपद ओलीजी की आराधना भी कर रहे हैं और इस दौरान आयंबिल तप भी कर रहे हैं । इसके साथ ही अब तक 8 से अधिक बार तैले की तपस्या भी कर चुके हैं । इसके अलावा सैकड़ों उपवास व एकासन तप भी कर चुके हैं । साथ ही वर्ष 2016 से लगातार उपासक सेवा भी दे रहे है जिसके अंतर्गत पर्यूषण पर्व पर विभिन्न क्षेत्रों या राज्यो में जाकर धर्म आराधना करवाना । गुरु इंगितानुसार पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र ,पनवेल, विरार आदि अनेक राज्यों में धर्म आराधना के लिए लगातार 9 वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं । वही तप की कड़ी में पंकज कोठारी ने जुलाई माह में ही अठाई तप पूर्ण किया है । पश्चात तप की अनुमोदना के लिए तेरापंथ समाज अध्यक्ष मितेश गादीया , सचिव विपिन भंडारी , वरिष्ठ सुश्रावक कैलाश श्रीमाल , राजेन्द्र चौधरी , किशोर मंडल से ओमी गादिया, दिव्य कोठारी , कल्प कोठारी, दिव्यांश गादिया आदि श्रावकगण द्वारा तपस्वी को मोती की माला पहनाकर व शाल ओढ़ाकर सम्मान किया गया । वही महिला मंडल से दीपा गादिया, प्रीति चौधरी, हंसा गादिया, सोनिया कोठारी द्वारा धर्म ग्रंथ भेंटकर तपस्वी के तप की अनुमोदना की । समाज अध्यक्ष मितेश गादीया ने उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए कहा जैन धर्म में तपस्या (तप) का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि यह आत्मा की शुद्धि, कर्मों के क्षय (नाश) और मोक्ष की प्राप्ति का प्रमुख साधन माना गया है। तप’ का शाब्दिक अर्थ है आत्मा को शरीर और भोग-विलास से अलग कर इंद्रिय-संयम, व्रत, संयम और साधना द्वारा आत्मिक शुद्धि प्राप्त करना। तपस्या द्वारा पुराने संचित कर्म (संचित और निर्जरा) का नाश होता है और नए कर्मों का बंधन रुकता है। तप से आत्मा का शुद्धिकरण होता है, जिससे वह अपने वास्तविक स्वरूप (अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख) की ओर अग्रसर होती है। तपस्या व्यक्ति को भोग, लोभ, क्रोध, मोह और आसक्ति से मुक्त करती है।इससे जीवन में सहनशीलता, संतोष और आत्मबल बढ़ता है । अंत में सभा सचिव विपिन भंडारी ने तपस्वी को निरंतर की गई तपस्या से सभी समाजजन को प्रेरणा लेने की बात कही , पश्चात सभी का आभार माना ।
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