झाबुआ – जैन समाज के सरल व्यक्तित्व के धनी कालीदेवी निवासी हजारीमल गादीया का 83 वर्ष की उम्र में सामायिक के दौरान देवलोकगमन हो गया है उनके देवलोकगमन होने से गादीया परिवार में व जैन समुदाय में गहन शोक की अनुभूति है ।
हजारीमल गादीया का जन्म 25 अप्रैल 1942 में पेटलावद में हुआ था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा पेटलावद में पूर्ण हुई । शिक्षा समाप्त होने के बाद शादी होने के बाद कालीदेवी में सोसायटी में नौकरी की । लेकिन इससे संतुष्ट नहीं होने पर कालीदेवी में किराना दुकान प्रारंभ की । साथ ही शासकीय कांट्रेक्टर के रूप में भी काम किया । साथ ही जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी तब कालीदेवी में भाजपा के लिए एकमात्र घर था हजारीमल गादीया का । इस कारण उन्होंने अपने जीवन में कई परेशानियो का सामना भी करना पड़ा । लेकिन परिस्थितियां से घबराएं नहीं और बड़ी सहजता के साथ विपरीत परिस्थितियों का सामना किया । बचपन से ही सरलता उनका स्वभाव था और युवावस्था में उन्होंने समाज व परिवार के प्रति समर्पण का प्रेरक मार्ग चुना। प्रौढ़ अवस्था में वे सतत सेवाकार्य, सदाचरण और शांतिपूर्ण व्यवहार के कारण समाज में विश्वसनीय, प्रिय एवं सम्मानित बने रहे। वृद्धावस्था में उनके अनुभव, विनम्रता और संयम ने अनेक लोगों के जीवन को दिशा दी । श्री गादीया को अपने देव , गुरु और धर्म पर अटूट आस्था थी और इसी के तहत तेरापंथ धर्मसंघ के प्रणेता आचार्य श्री भिक्षु की समाधिस्थल सिरीयारी प्रायः जाना होता था । वही आचार्य श्री भिक्षु समाधिस्थल के सदस्य भी हैं तथा संकट सरन पार्श्वनाथ जैन मंदिर कालीदेवी के प्राण प्रतिष्ठा के लाभार्थी भी है ।साथ ही आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में सबसे पहले जीवन विज्ञान को प्रारंभ भी इन्होंने ही किया । क्षेत्र में साधु-संतों के आवागमन पर रास्ते की सेवा और दर्शन करना, उनकी जीवनशैली का हिस्सा था । सरलता इतनी थी कि कभी जीवन में किसी का बूरा करना तो दूर , उसके बारे में कभी सोचा ही नहीं । संभवतः उनको गुस्सा कभी आता ही नहीं था । यदि कोई उनसे नाराज़ होता था तो दूसरे दिन फिर उनसे मिलने चले जाते थे । सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्हें बच्चों से बहुत लगाव और प्रेम था तथा सभी बच्चों को अपने द्वारा दिए निक नेम से पुकारते थे । सबसे खास बात कि श्री भिक्षु समाधिस्थल सिरीयारी के सदस्य भी हैं व संकट हरन पार्श्वनाथ जैन मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के लाभार्थी भी थे । वही आदिवासी बाहुल्य जिले में जीवन विज्ञान जैसे आयाम की शुरुआत भी इन्हीं के द्वारा की गई थी । वही श्री सिद्ध हनुमान मंदिर कालीदेवी पर संपूर्ण जीणोद्धार और शिखर स्थापना महोत्सव को लेकर संपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन के लाभार्थी उनके पुत्र कमल गादीया थे और हजारीमल गादीया के देवलोकगमन होने से एक दिन पूर्व याने 7 दिसंबर को महाआरती और भंडारे को लेकर आयोजन में हजारीमल गादीया ने खुशी खुशी सहभागिता भी की थी । संपूर्ण लाभार्थी उनके पुत्र होने से उन्हें खुशी की झलक अलग ही नजर आ रही थी । लेकिन होनी को कौन टाल सकता है आयोजन के दूसरे दिन 8 दिसंबर को सुबह करीब 10 बजे सामायिक के दौरान अचानक ही कुर्सी से गिर गये । और संभवतः हार्टअटैक आने के कारण देवलोकगमन हो गया और इस तरह जैन समाज और तेरापंथ समाज ने एक हीरे के समान , सहज, सरल और धार्मिक व्यक्तिव के धनी को खो दिया ।
श्री हजारीमल गादीया का पूरा जीवन सेवाभाव, सहनशीलता, सहज स्वभाव और नैतिक मूल्यों के अनुकरणीय पालन का श्रेष्ठ उदाहरण रहा। जन्म से लेकर जीवन के अंतिम क्षणों तक उन्होंने जैन आदर्शों—अहिंसा, सत्य और सौम्यता—को अपने आचरण में उतारा । जैन दर्शन के अनुसार सन्मार्ग पर चले व्यक्ति की आत्मा का उच्च गति से गमन “पुण्य के उत्थान” का परिणाम होता है। समाज का विश्वास है कि हजारीमल गादीया का देवलोकगमन उनकी दिव्य, निर्मल और सेवा-प्रधान आत्मिक यात्रा का पावन फल है।
जैन समाज, नगरवासियों तथा परिचितों ने उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताया और उनकी शांति के लिए श्रद्धांजलि अर्पित की । सकल जैन श्री संघ कालीदेवी, सकल जैन श्री संघ झाबुआ , सकल जैन श्रीसंघ झाबुआ , जैन स्थानकवासी समाज झाबुआ, मालवा सभा , तेरापंथ समाज झाबुआ, तेरापंथ समाज पेटलावद , कांट्रेक्टर एसोसिएशन , सामाजिक महासंघ झाबुआ आदि अनेक धार्मिक समाज और संगठनों ने उनके देवलोकगमन पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की । श्री हजारीमल गादीया की सरलता, सेवा और नैतिकता सदैव प्रेरणा बनकर स्मरण में जीवित रहेंगी ।
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