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झाबुआ

भविष्यो रक्षति रक्षितः’ – अर्थात् जब हम बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा करते हैं, तभी राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित रहता है।

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लेखक चंचल भण्डारी

‘भविष्यो रक्षति रक्षितः’ – अर्थात् जब हम बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा करते हैं, तभी राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित रहता है। इसी आदर्श वाक्य को माननीय राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने अपनाया है। आज हम भारत में बच्चों (0 से 18 वर्ष) के लिए कार्य करने वाली तीन सर्वोच्च संस्थाओं – राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग और बाल कल्याण समिति – के बारे में संक्षेप में जानेंगे।
1) राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) “बच्चों के अधिकारों का राष्ट्रीय स्तर पर प्रहरी”
यह भारत का सर्वोच्च वैधानिक आयोग है, जिसे CPCR Act, 2005 की धारा 3 के तहत स्थापित किया गया और मार्च 2007 में गठित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि सभी कानून, नीतियाँ और सरकारी कार्यक्रम संविधान तथा संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन 1989 के अनुरूप लागू हों।
संरचना: आयोग में एक चेयरपर्सन और छह सदस्य होते हैं, जिनका चयन शिक्षा, बाल स्वास्थ्य, किशोर न्याय, मनोविज्ञान और कानून जैसे क्षेत्रों से किया जाता है। कार्यकाल 3 वर्षों का होता है।
प्रमुख कार्य:
बाल अधिकारों से जुड़े कानूनों की समीक्षा और सिफारिशें, अधिकारों के उल्लंघन की जांच, सरकार को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना, जागरूकता और अनुसंधान कार्यक्रम, POCSO, RTE और JJ Act के तहत निगरानी एवं अन्य संबंधित कार्य।
2) राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR) “राज्य स्तर पर बच्चों की आवाज़”
राष्ट्रीय आयोग का पूरक रूप प्रत्येक राज्य में CPCR Act, 2005 की धारा 17 के तहत राज्य आयोग गठित होता है। यह आयोग केवल राज्य के भीतर कार्य करता है और बच्चों से जुड़ी स्थानीय समस्याओं पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करता है।
मुख्य जिम्मेदारियाँ:
राज्य में शिकायतों की जांच, राज्य सरकार को नीतिगत सुझाव, शिक्षा, स्वास्थ्य और संरक्षण योजनाओं की समीक्षा, बाल मजदूरी, trafficking, बाल-विवाह आदि पर निगरानी एवं अन्य संबंधित कार्य।
3) बाल कल्याण समिति (CWC) “बच्चों की बाल-अदालत”
इसे सही अर्थों में “बच्चों की बाल-अदालत” कहा जाता है। इसका गठन किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 27 के अंतर्गत प्रत्येक जिले में किया जाता है।
संरचना: एक चेयरपर्सन और चार सदस्य (कम से कम एक महिला सदस्य अनिवार्य)। सभी को बाल कल्याण क्षेत्र में अनुभव होना आवश्यक है। कार्यकाल 3 वर्षों का होता है।
मुख्य कार्य:
देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के मामलों में निर्णय, बच्चों को शेल्टर होम/फोस्टर केयर में सुरक्षित स्थान देना, पुनर्वास और पारिवारिक बहाली
बाल-श्रम, भिक्षावृत्ति और बाल-विवाह की रोकथाम, आवश्यकतानुसार स्वतः संज्ञान (suo moto) जांच आदि अन्य संबंधित कार्य।

शिकायत प्रक्रिया
चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर 24×7 टोल-फ्री कॉल
राष्ट्रीय या राज्य आयोग की वेबसाइट/कार्यालय में लिखित या ऑनलाइन शिकायत
या जिले की बाल कल्याण समिति में कोई भी व्यक्ति सीधे शिकायत दर्ज करा सकता है।  (सभी मामलों में शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखी जाती है।)
निष्कर्ष
NCPCR और SCPCR जहाँ नीति निर्माण, निगरानी और संरक्षण की भूमिका निभाते हैं, वहीं CWC ज़मीनी स्तर पर बच्चों को तुरंत सुरक्षा, न्याय और पुनर्वास उपलब्ध कराती है। इन तीनों संस्थाओं का समन्वित प्रयास ही भारत के बच्चों के सुरक्षित, सम्मानजनक और उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है।

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