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झाबुआ

झाबुआ में दीपोत्सव का उल्लास: श्री गोवर्धन नाथ मंदिर में प्रतिदिन सज रही दीपमालिका,

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अंचल की ऐतिहासिक ‘गाय-गोहरी’ परंपरा बनेगी मुख्य आकर्षण
पुष्टि मार्ग में गोवर्धन पूजन का महात्म्य: अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य-फल दायक*

झाबुआ। नगर के प्रमुख आस्था केंद्र, श्री गोवर्धन नाथ जी मंदिर (श्री गोवर्धननाथजी हवेली) में इस वर्ष का दीपोत्सव 4 नवंबर से 11 नवंबर तक अत्यंत भव्यता के साथ आयोजित किया जा रहा है । दीपावली के इस पावन पर्व को लेकर मंदिर प्रांगण में तैयारियां पूर्ण हो गई हैं। मंदिर परिसर में आकर्षक रंग-रोगन, विशेष विद्युत सज्जा की गई है, जिससे पूरा मंदिर प्रांगण रोशनी से जगमग है।

पुष्टिमार्गी परंपरा में गोवर्धन पूजा का अत्यंत विशिष्ट एवं महिमामय स्थान है।
श्री गोवर्धननाथजी मंदिर के पीठाधीश व सर्वाध्यक्ष गोस्वामी दिव्येशकुमारजी महाराज श्री ने बताया कि

शास्त्रों व पुष्टि सिद्धांतों के अनुसार गोवर्धन पूजा कोई साधारण कर्मकांड न होकर एक प्रत्यक्ष ‘गोवर्धन यज्ञ’ है। श्रीनाथ जी के स्वरूप में स्वयं श्री गिरिराज जी का पूजन किया जाता है। पुष्टि मार्ग में मान्यता है कि गोवर्धन पूजा का दर्शन व इसमें सम्मिलित होना सौ अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य-फल प्रदान करने वाला है। द्वापर युग में देवराज इंद्र का मानभंग कर भगवान श्री कृष्ण ने प्रकृति एवं गोवर्धन पर्वत की पूजा का विधान प्रारंभ किया था, जो आज भी पुष्टि मार्गीय मंदिरों में उसी भाव और भव्यता के साथ जीवंत है। उत्सव का शुभारंभ 4 नवंबर को दीपमालिका से हुआ, जिसका गूढ़ भाव अंतरमन के अज्ञान को मिटाकर प्रभु श्रीजी के समक्ष भक्ति का प्रकाश जगाना है।

### विशेष कॉलम: झाबुआ की अनूठी और ऐतिहासिक ‘गाय-गोहरी’ परंपरा

झाबुआ के दीपोत्सव और गोवर्धन पूजा की सबसे अनूठी पहचान यहाँ का प्रसिद्ध ‘गाय-गोहरी’ पर्व है, जो अपनी गहरी आस्था और रोमांच के लिए पूरे देश में जाना जाता है।

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: इतिहासविदों और पुष्टिमार्गीय मान्यताओं के अनुसार, झाबुआ के तत्कालीन शासक श्रीमंत महाराजा गोपाल सिंह जी गोवर्धन नाथ जी के परम भक्त थे। उनके शासनकाल (लगभग 1868 के आसपास) से ही इस परंपरा का भव्य रूप से निर्वहन किया जा रहा है, जो आज तक अनवरत चली आ रही है।
  • क्या है गाय-गोहरी की परंपरा: दीपावली के अगले दिन (गोवर्धन पूजा/अन्नकूट के अवसर पर) ग्रामीण व शहरी अंचल में गोधन की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन गौवंश को हल्दी, मेंहदी, गेरू और प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता है, उनके सींगों पर मोरपंख बांधे जाते हैं और गले में घंटी-घुंघरू पहनाए जाते हैं।
  • मन्नत पूरी होने पर लेटते हैं मन्नतधारी: गोवर्धन नाथ मंदिर के सामने मन्नतधारी (जिन्होंने अपने परिवार की सुख-समृद्धि, संकट मुक्ति या स्वास्थ्य की मन्नत मांगी होती है) जमीन पर उलटे लेट जाते हैं। इसके बाद सजी हुई गायों के झुंड को उनके ऊपर से गुजारा जाता है। इस बीच मंदिर मंडल के सेवक व भक्तजन गायों के पीछे भजन कीर्तन करते हुए मंदिर की पांच परिक्रमा लगाते हैं।

* आस्था और सहजीवन का प्रतीक: आदिवासी और स्थानीय समाज के अनुसार यह परंपरा मानव और पशु के बीच गहरे आत्मीय संबंध, कृतज्ञता और लोक-आस्था का प्रतीक है। हजारों की संख्या में मौजूद श्रद्धालुओं की उपस्थिति और कड़े सुरक्षा प्रबंधों के बीच यह ऐतिहासिक परंपरा पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न होती है।

दीपोत्सव 2026: प्रमुख तिथियां एवं मुख्य आयोजन

  • 07 नवंबर (शनिवार) – धनतेरस
  • 08 नवंबर (रविवार) –
    रूप चतुर्दशी व दीपावली
    मंगला दर्शन प्रातः 5:00 बजे ‘हटड़ी दर्शन’ एवं ‘कान-जगाई’ (गौ-आगमन) सायं 6:30बजे
  • 09 नवंबर (सोमवार) –
    गोवर्धन पूजा प्रातः 10:30 बजे गाय-गोहरी सायं 4:00 बजे
    अन्नकूट दर्शन: साया 5:30 बजे 11 नवंबर (बुधवार) – यम द्वितीया / भाईदूज

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